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और अब बम भी होने चाहिये हर्बल

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पंकज अवधिया

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक पंकज अवधिया का चिट्ठा
दर्द हिन्दुस्तानी

देश के सभी शहर बारुद की गन्ध से महक रहे है। जी नही मै आतंकवाद पर नही लिखने जा रहा हूँ। मै तो प्रतिदिन लाखो की तादाद के फोडे जा रहे बमो की बात कर रहा हूँ जिन्हे आप चौबीसो घंटे फूटते सुन सकते है। पहले रात को यह शोर कम हो जाता था पर अब तो कोई भी बहाना मिले बम अवश्य फोडे जाते है। बमो की आवाज मे भी इजाफा हो गया है। सँकरी गलियो मे रहने वाले लोग या अस्पताल मे पडे मरीज अचानक ही चौक पडते है। रंग मे भंग न हो इसलिये मन-मसोस कर रह जाते है। बमो की आवाज से घरो के काँच थरथराने लगते है। कई बार तो आस-पास खडी गाडियो के शीशे टूट जाते है। इन बमो से कई प्रकार के प्रदूषण होते है। धुँए से लोगो विशेषकर बच्चो को साँस की तकलीफ हो जाती है। हमारे कान सुनने की स्वाभाविक क्षमता खोते जा रहे है फिर भी हमारे ही अपने लोग यह कर रहे है और आने वाले समय मे करते रहेंगे। यह कडवा सच है। रोज हो रहे धमाको के बीच मै यह सोचता रहता हूँ कि क्या इन बमो को समाज के लिये उपयोगी बनाया जा सकता है?

कुछ महिनो पहले अपने युवा मित्र के साथ टेबल टेनिस खेलते हुये मैने उसके सामने प्रस्ताव रखा कि सुगन्ध फैलाने वाले बम क्यो नही बनाये जाते? दीपावाली के बाद पूरा शहर महकने लगे तो कितना अच्छा होगा। अभी तो बारुद की बदबू से शहर कई दिनो तक रहने लायक नही हो पाते है। कई लोग दीपावली के तुरंत बाद पहाडो पर चले जाते है। युवा मित्र फटाको का खानदानी निर्माता है। उसने आधे मे ही खेल छोडा और घर चला गया। कुछ घंटो बाद फोन आया कि पिता जी तो हँस रहे है इस प्रस्ताव पर मै इस पर काम करने को तैयार हूँ। बस फिर क्या था हम लोगो ने इस पर काम शुरु कर दिया। बारुद की इतनी तेज गन्ध को दबा पाना बडा मुश्किल लग रहा है पर फिर भी प्रयास चल रहे है।

कुछ वर्षो पहले मैने बतौर सलाहकार मच्छरो को भगाने के लिये एक हर्बल नुस्खा बनाया था। यह बहुपयोगी था। इसे जलाने से वातावरण शुद्ध होता था। मख्खियाँ भाग जाती थी और मच्छर भी घरो से दूर रहना बेहतर समझते थे। इस नुस्खे को चीटीयो के पास रखने से वे दूर चली जाती थी। इसी नुस्खे से दमा के रोगियो को इनहेलर की जरुरत नही पडती थी। यदि आप बाहर है तो इस नुस्खे का लेप हाथ धोने के काम भी आ जाता था। मतलब यह कि एक पंथ और कई काज। दिल्ली के एक महाश्य ने इसे खरीदा और अब वे इसके लायसेंस के लिये लगे हुये है। मेरा काम खत्म हो चुका है। नये बम मे जब हमने इसे प्रयोग किया तो यह आशा जागी कि अब बम के फूटने से मच्छरो से भी निजात मिले सकेगी। मेरे इस युवा मित्र की कई सीमाए है पर उसका उत्साह देखते ही बनता है।

महंगे और जमीनी स्तर पर बेकार शोध करने वाले शोधकर्ताओ को अब आम लोगो की समस्याओ पर शोध कर उन्हे परेशानियो से मुक्ति दिलवानी चाहिये- ऐसा मेरा मानना है। आप मंगल मे जाने के लिये आतुर है पर जमीनी स्तर पर बमो से उत्पन्न प्रदूषण से नही निपट पा रहे है। इस प्रदूषण से दुनिया मे बहुत से देश प्रभावित है। पटाखो का प्रचलन सब ओर बढ रहा है। हम सब कुछ जानते हुये भी अपनी खुशी के लिये अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे है। बारातो मे नाचते हुये युवाओ से मै पूछता हूँ कि बम फोडने से किस प्रकार का आनन्द मिलता है? तो सामान्य सा जवाब मिलता है कि आवाज मे जो रोमांच है वैसा किसी मे नही। तो क्या आने वाले समय मे हम सभी बारातियो को ऐसे हेडफोन दे सकते है जिसमे सभी को अपने रोमांच की आवश्यकता के हिसाब से आवाज सुनने को मिले। बम की आवाज आस-पास न फैले केवल हेडफोन से सुनने वालो तक जाये। अभी भले ही यह अकल्पनीय लगे पर इस तरह के समाधान सामने लाने होंगे ताकि रंग भी बना रहे और किसी को दिक्कत भी न हो।

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(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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