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कितना कम जानते है हम देश की पर्यावरणीय सम्स्याओ के विषय मे
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कितना कम जानते है हम देश की पर्यावरणीय सम्स्याओ के विषय मे

हिन्दी वेबसाइट में पंकज अवधिया के लेख
पंकज अवधिया

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक पंकज अवधिया का चिट्ठा
दर्द हिन्दुस्तानी

क्या आपने नियमगिरि का नाम सुना है? ज्यादातर लोगो का जवाब नकारात्मक ही होगा। नियमगिरि पर्वत उडीसा मे है और वहाँ के मूल निवासी आजकल अपने घर को बचाने के लिये संघर्ष कर रहे है। इस पर्वत पर बाक्साइट का खनन किया जाना है और इस खनन से पहले वहाँ के निवासियो को विस्थापित किया जाना है। कोई भी अपने घर ऐसे कैसे छोड सकता है? मूल निवासियो ने मना कर दिया और बात अब सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुँची है। नियमगिरि घने वनो से आच्छादित है और अपने कुछ दिनो के सर्वेक्षण से मैने दुर्लभ जडी-बूटियो और वन्य प्राणियो पर वृहत जानकारियाँ एकत्र की। बाक्साइट की आधुनिक समाज को बहुत जरुरत है पर नियमगिरि मे जो जैव-विविधता है उसकी कीमत पर यह खनन बहुत महंगा है। बहुत से संगठन मूल निवासियो से मिलकर नियमगिरि को बचाने संघर्ष कर रहे है। मै यकीन से यह बात कह सकता हूँ कि आपको दुनिया भर के पर्यावरण की जानकारी है पर आपके अपने देश मे होने वाले इस विनाश के विषय मे आप कुछ नही जानते। इसके लिये किसे जिम्मेदार ठहराया जाये? आप तो जिम्मेदार है ही पर बडी जिम्मेदारी हमारे प्रसार तंत्र की है जो ऐसी खबरो को आप तक पहुँचने ही नही देता।

अंग्रेजी अखबारो ने नियमगिरि पर काफी खबरे छापी है। इंटरनेट पर भी इस पर आपको काफी वेबसाइट मिल जायेंगी पर सबमे संघर्ष की बात मिलेगी। नियमगिरि क्या है और इसका बचा रहना धरती के पर्यावरण के लिये क्यो जरूरी है यह कही भी पढने या जानने को नही मिलेगा। क्या लेखक इस पर लिखना नही चाहते या फिर वे जानबूझकर ऐसा कर रहे है? यह अबूझ प्रश्न है।

मैने अपने सर्वेक्षणो के आधार पर जब हिन्दी और अंग्रेजी मे लेख लिखने आरम्भ किये तो सर्च इंजिनो ने उन्हे दिखाना आरम्भ किया पर जल्दी ही ये लेख सर्च इंन्जिन से गायब हो गये। आज भी ये लेख इंटरनेट पर है पर सर्च इंजिन इन्हे नही दिखाते है। मैने तो खनन मे लगे संस्थान या इससे जुडी राजनीति की बजाय जैव-विविधता पर आधारित लेख लिखे थे। इस घटना के बाद मुझे अहसास हो गया कि समस्या सचमुच गम्भीर है और इस पर लगातार लिखना होगा।

यह कडवा सच है कि हमारा मीडिया राजनीति से सम्बन्धित विषयो मे दक्ष है पर अन्य विषयो पर उसे विशेषज्ञो पर निर्भर रहना पडता है। देश की राजधानी मे बैठे या बडी संस्थानो मे कार्यरत विशेषज्ञो से ही राय ले ली जाती है और उसे सही भी मान लिया जाता है। नियमगिरि की ही बात करे। सर्वेक्षण के दौरान हम आलाबेली गाँव गये तो वहाँ के पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि कल रात हाथी आये थे। मैने उनके चलने से दबी जमीन की तस्वीरे ली और फिर आम लोगो के अनुभवो के आधार पर शोध आलेख लिखा पर उत्तरी भारत के एक अनुसन्धान संस्थान के वन्य पशु विशेषज्ञो की राय सुनी गयी कि नियमगिरि मे वन्य पशु है ही नही। मीडिया ने उसी बयान को माना और कानूनविदो ने भी। किसी ने वहाँ जाकर सत्य जानने की कोशिश नही की।

मुझे कई बार पत्रकारिता सीखाने वाले संस्थानो के लोगो से मिलने का मौका मिला है। मै उनसे पूछता हूँ कि क्या देश की महत्वपूर्ण पर्यावरण से जुडी सम्स्याए छात्रो को बतायी जाती है तो उनमे से कुछ सकारात्मक उत्तर देते है। मै फिर पूछता हूँ कि क्या पर्यावरण विशेषज्ञ यह बात बताते है तो वे कहते है कि नही जी, उन्हे किताबो के माध्यम से यह बात बतायी जाती है। मेरा बस चले और वे मुझे सुनना चाहे तो मै देश भर मे घूमकर जैव-विविधता की बाते इन छात्रो को बताना चाहूंगा ताकि प्रजातंत्र के चौथे खम्बे का दायित्व वे आशानुरूप ढंग से निभा सके। बेहतर तो यह होगा कि दोनो पक्षो की बात ये छात्र सुने और फिर अपने विवेक से समाधान सुझाये। लगातार बढ रही समस्याओ को देखते हुये विषय विशेषज्ञ पत्रकारो की एक पूरी पीढी तैयार करने की जरुरत है।

नियमगिरि जैसे विषयो को जन-जन तक पहुँचाना जरूरी है। धरती के किसी भाग मे होने वाला पर्यावरणीय असंतुलन सभी को किसी न किसी रूप मे प्रभावित करता है। इस नजरिये से तो नियमगिरि की समस्या पूरे विश्व की समस्या है। आम जन के इससे जुडने से राजनेता भी सजग होंगे और मारे डर ही सही पर जनविरोधी निर्णय करने से बाज आयेंगे- ऐसा मेरा मानना है।

नियमगिरि पर कविता

नियमगिरि पर शोध आलेख

नियमगिरि की जैव-विविधता

नियमगिरि पर अन्य हिन्दी लेख

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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